ऐसे विशेषज्ञ की तरह लोगों के व्यक्तित्व को पहचानें

हर इंसान की अपनी एक पहचान होती है जो उसकी पर्सनैलिटी में दिखाई देती है। अगर आप किसी को देखकर उसकी पर्सनैलिटी के बारे में अनुमान लगाना चाहते हैं तो ये स्लाइडशो आपकी काफी मदद करेगा।

 

व्यक्तित्व को पहचानें

लोगों को पहचानना किसी कला से कम नहीं है। कोई किसी के पहनाव से व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व की जानकारी हासिल करता है तो कोई बातचीत के सलीके से। मतलब साफ है कि हर कोई एसेा करने में समर्थ नहीं है। लेकिन शायद आप नहीं जानते कि आप भी इस कला में माहिर हो सकते हैं। जी हां! दरअसल आप चाहें तो लोगों के शारीरिक गठन पर जरा सी नजर दौड़ाकर उनके पूरे व्यक्तित्व का कच्चा चिट्ठा खोल सकते हैं। आइये जानते हैं कैसे।

व्यक्तित्व को पहचानें

लीडर (जूपिटेरियन टाइप )

शारीरिक गठन – ये लोग ज्यादा लम्बे नहीं होते। शारीर से ये गोल मटोल नहीं होते। लेकिन इनका वजन काफी ज्यादा होता है। इन लोगों को आप हेल्दी कह सकते हैं। इनके चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक देखने को मिलती है। ये लोग लगभग हर क्षेत्र में लीडर की माफिक जिंदगी जीते हैं। इनकी आंखों में गहराई से देखें तो आप इनमें किसी विचारक या फिर दार्शनिक पाएंगे।
नैन नक्श – इनकी आंखें हर समय कुछ न कुछ बयां करती नजर आती हैं। नाक सीधी होती है और ठुड्डी में डिम्पल पड़ता है।

लीडर (जूपिटेरियन टाइप )
 

एकाकी (सेटर्नियन टाइप)

शारीरिक गठन – ये लोग अकसर पतले और लम्बे होते हैं। इनका शारीरिक गठन सिकुडत्रा हुआ होता है। इस किस्म के कुछ लोगों के बहुत खराब पोस्चर्स होते हैं। हालांकि सबका ऐसा नहीं होता। इनके ऊंचे कंधे और लम्बे हाथ होते हैं।
नैन नक्श – इनका चेहरा अंडाकार होता है। इनकी आंखें भौहों के काफी नजदीक नजर आती है। गाल हड्डियां काफी ऊंची होती हैं। इनके एक्सप्रेशन खासा उदासीन नजर आते हैं।

एकाकी (सेटर्नियन टाइप)

सपने देखने वाला (लुनेरियन टाइप)

शारीरिक गठन – ये लोग सामान्यतः लम्बे, सरल, गुदगुदे होते हैं। आप इन्हें गोलमटोल भी कह सकते हैं। इनके हाथ और पैर सामान्य लोगों की तुलना में काफी लम्बे होते हैं। इनकी चाल धीमी होती है जिसे वे उपयुक्त भी मानते हैं।
नैन नक्श – इनका गोल और बड़ा सिर होता है। ये काफी गोरे होते हैं। इनके खूबसूरत बाल होते हैं। सामान्यतः इनके बाल सीधे होते हैं। आंखें गोल होती है। कई दफा देखने में आया है कि इन लोगों की पलकें काफी घनी होती हैं।

सपने देखने वाला (लुनेरियन टाइप)

निर्भय (मार्टियन टाइप)

शारीरिक गठन – इनकी सामान्य हाइट होती है। लेकिन पोस्चर लम्बवत्त। शरीर से मस्कुलर होते हैं। इनका सीना चैड़ा होता है, गर्दन मोटी होती है। यही नहीं इनके पांव काफी मजबू होते हैं।
नैन नक्श – इनका चेहरा गोल या फिर स्क्वायर होता है। इनकी त्वचा मोटी होती है। इनकी आंखें इनकी हर हरकत का आइना होती है। इनकी आंखें गोल और छोटी होती हैं। इनकी नाक लम्बी और सीधी होती है या फिर रोमन नोज़ होती है। इनके कान छोटे होते हैं जो कि काफी हद तक सिर के नजदीक होते हैं।

निर्भय (मार्टियन टाइप)

खुशकिस्मत (अपोलो टाइप)

शारीरिक गठन – ये हैंड्सम होते हैं। इनका कद सामान्य होता है। इसके अलावा इनका शरीर शेप में नजर आता है। इनका शरीर एथलीट जैसा लगता है; लेकिन जरा भी मोटे नहीं होते। इनका शरीर आकर्षण का एक बड़ा केन्द्र होता है।
नैन नक्श – ये लोग गोरे होते हैं साथ ही चेहरे पर लालिमा नजर आती है। इनके वेवी ब्लंड बाल होते हैं। इनकी आंखों में खास किस्म की चमक देखने को मिलती है।

खुशकिस्मत (अपोलो टाइप)

प्रसिद्धी और भाग्य (मर्कुरियन)

शारीरिक गठन – ये सामान्य लोगों की तुलना में थोड़े से कद काठी में छोटे होते हैं। पांव भी इनके छोटे होते हैं। हाथ की लम्बाई औसत होती है। ये लोग वजन की तुलना में भी सामान्य दिखते हैं। लेकिन उम्र के साथ साथ इनका वजन भी बढ़ने लगता है।
नैन नक्श – इन्हें इनके कान के जरिये आसानी से पहचाना जा सकता है। इनके कान सिर के काफी नजदीक होते हैं और ये गोल होने की बजाय प्वाइंटेड होते हैं।

प्रसिद्धी और भाग्य (मर्कुरियन)

जानें क्‍यों सफल होने के लिए निजी जिम्मेदारी है बेहद जरूरी

सफलता की कोई कुंजी नहीं है, बस कुछ बातें हैं जिनको अपनाने से आप सफलता की सीढ़ी चढ़ते जाते हैं, इसमें एक है खुद की जिम्‍मेदारी, इस स्‍लाइडशो में जानते हैं सफल होने के लिए यह कितना जरूरी है।

 

क्या है निजी जिम्मेदारी?

निजि जिम्मेदारी हमारे जीवन में घटने वाली घटनाओं, परिस्थितियों और उनके प्रति दी प्रतिक्रियाओं के प्रति सचेत नियंत्रण होता है। हम सभी अपने द्वारा किये गए कमों के लिये जिम्मेदार हैं, फिर चाहे हम इन्हें पसंद करें या न करें। हम अपने जीवन में क्या कर रहे हैं और जो हम कर चुके हैं, ये पूरी तरह हमारा कर्म है। अगर हम अपनी जिम्मेदारी से भागने के लिये कोई तर्क दें, तो ये केवल हमारी प्रतिभा और सफलता की संभवना को कम करता है। जीवन में सफल होने के लिये निजी जिम्मेदारी लेना और इसका सही मतलब समझना बेहद जरूरी है।

क्या है निजी जिम्मेदारी?

निजी जिम्मेदारी लेने के फायदे

निजी जिम्मेदारी लेकर, हमें खुद की जिंदगी, अपनी शर्तों और नियमों पर जीने की आज़ादी मिलती है। जिस दिन से आप गंभीरता से निजी जिम्मेदारी लेना शुरु कर देते हैं, आपको अपनी क्षमता और अहमियत का अहसास होता है। या कहिये आप खुद को पहचान पाते हैं। साथ ही निजी जिम्मेदारी लेना सामान्य रूप से व्यक्तिगत विकास के लिए नींव की तरह होता है। अपनी भूमिका को स्वीकार करके, आप खुद के सुधार और विकास का अ वसर पाते हैं।

निजी जिम्मेदारी लेने के फायदे

मुश्किल कामो को भी करने में मदद मिलती है

जहां एक ओर सभी सबसे आसान और तेज़ रास्ता चुन सफल बनना चाहते है, निजी जिम्मेदारी लेने की भावना के साथ आप मुश्किल से मुश्किल रास्तो को पार सफल बन सकते हैं। शॉर्ट कट से मिली सफलता ज्यादा दिन नहीं टिकती, मगर मेहनत से कमाई सफलता आसानी से साथ नहीं छोड़ती। निजी जिम्मेदारी की भावना अपना आप मुश्किलों की आंख से आंख मिलाकर आने वाली मुश्किलों का सामना कर पाते हैं और उन्हें सुलढाकर आगे भी बढ़ पाते हैं।

मुश्किल कामो को भी करने में मदद मिलती है
 कोई आपको डरा नहीं सकता

जब आप अपने दिल से काम करते हैं तो आप अपने आप को सशक्त बना पाते हैं और सफलता प्रप्त कर पाते हैं। अपनी निजी जिम्मेदारियों को समझ कर कभी दूसरो से भयभीत महसुस नहीं करते हैं। और कोई भी काम करने के लिये आपको किसी से भी डरने या इजाज़त लेने की जरुरत नही होती है। इस तरह आप अपना बेस्ट दे पाते ।

कोई आपको डरा नहीं सकता

असफलता को स्वीकार कर नई शुरुआत

जो लोग हारने से डरते हैं या असफलता को स्वाकार नहीं कर पाते, उन्हें सफलता का स्वाद चखने को नहीं मिलता है। ध्यान रखें, असफलता निश्चित ही मुश्किल होती है, लेकिन हर किसी को जिंदगी में सफलता पाने के लिये की बार पहले असफल होना पड़ता है। निजी जिम्मेदारियों को समझने वाला व्यक्ति को असफलता सिखाती है की उसे अपने प्रदर्शन में क्या बदलाव करने चाहिये, कहा सुधार करना चाहिये, और इन बदलावों और सुधार के बाद सफलता उसको मिलती ही है।

असफलता को स्वीकार कर नई शुरुआत

इन 5 तरीकों से गर्मी में दिमाग को रखें ठंडा

जब आप तनावग्रस्‍त होते हैं तो आपका चिड़चिड़ा होना स्‍वाभाविक है, यही आदतें आपके मानसिक स्‍वस्‍थ्‍य के बारे में बताती है।

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य

बदलती जीवनशैली और भागदौड़ भरी जिंदगी में अपने मस्तिष्‍क का ख्‍याल रखना बहुत जरूरी हो जाता है। क्‍योंकि जब आप तनावग्रस्‍त होते हैं तो आपका चिड़चिड़ा होना स्‍वाभाविक है, यही आदतें आपके मानसिक स्‍वस्‍थ्‍य के बारे में बताती है। ऐसे में दिमाग को कैसे स्‍वस्‍थ रखा जाए आइए जानते हैं आगे की स्‍लाइड से…

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य
 

नियमित दिनचर्या

अपनी दिनचर्या को नियमित रखें। सुबह उठने और रात को सोने का समय निर्धारित करें। नींद पूरी लें। ब्रेकफास्‍ट, लंच और डिनर का भी समय निर्धारित करें और उसी के आधार पर अपने काम को समयबद्ध तरीके से करें।

नियमित दिनचर्या
 

व्‍यायाम

स्‍वस्‍थ मस्तिष्‍क के लिए व्‍यायाम करना बहुत जरूरी है। इससे आप अंदुरूनी रूप से फिट रहेंगे। शरीर में रक्‍तसंचार ठीक से होगा।

व्‍यायाम
 
स्‍वस्‍थ्‍य खानपान

 

सबसे बड़ी बात कि खानपान का ध्‍यान रखना बहुत जरूरी है। ऐसी चीजों का सेवन मत करें जिससे आपका स्‍वास्‍थ्‍य बिगड़ जाए। हमेंशा, हरी सब्जियां, दालें, दूध, अंडा, मछली आदि चीजों का सेवन करें।

स्‍वस्‍थ्‍य खानपान
 

गैजेट्स से रहें दूर

स्‍मार्टफोन, कंप्‍यूटर, लैपटॉप से दूरी बनाएं। जरूरी हो तभी इनका इस्‍तेमाल करें अन्‍यथा न करें। खासकर सोते समय जरूर किसी भी गैजेट्स से दूर रहें।

गैजेट्स से रहें दूर
 

एक्टिव रहें

एक्टिव रहने के लिए आप किसी खेल में हिस्‍सा ले सकते हैं। न्‍यूजपेपर, नॉवेल या कोई भी अच्‍छी बुक पढ़ने की आदत डालें। इन सब से आपका दिमाग स्‍वस्‍थ रहेगा और आप एक्टिव रहेंगे।

एक्टिव रहें

इन 5 तरीकों को अपनाएं स्ट्रेस को दूर भगाएं

तनाव को दूर न किया जाये तो यह अवसाद बन जाता है, इसलिए इससे बचना बहुत जरूरी है, तनाव दूर करने के आसान तरीकों के बारे में यहां पढ़ें।

तनाव के कारण

वर्तमान में न केवल महानगरों में बल्कि छोटे शहरों में भी तनाव आम बात होती जा रही है। डब्यूएचओ की मानें तो दुनियाभर में सभी उम्र वर्ग के लगभग 30 करोड़ से अधिक लोग तनाव से ग्रस्तद हैं। लोगों में घट रही अक्षमता का सबसे बड़ा कारण तनाव ही है। पुरुषों की तुलना में महिलायें तनाव का शिकार अधिक हो रही हैं। आगे बढ़ने की होड़ और ज्यादातर वक्त कंप्यूटर और मोबाइल पर बिताने के कारण भी तनाव अधिक हो रहा है। दिमाग को जब पूरा आराम नहीं मिल पाता तभी तनाव होता है। चिकित्सकीय भाषा में तनाव को शरीर के होमियोस्टैसिस में गड़बड़ी माना जाता है। इस स्थिति में इंसान शारीरिक, मानसिक व मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर होने लगता है। तनाव के कारण एड्रीनलीन और कार्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ने लगता है। तनाव धीरे-धीरे अवसाद का रूप ले लेता है, जो कि गंभीर स्थिति है। इसलिए जितनी जल्दी हो सके तनाव से छुटकारा पा लेना चाहिए। इस स्लाइडशो में आसानी से तनाव दूर करने के 5 अप्रत्याशित तरीकों के बारे में बता रहे हैं।

तनाव के कारण
 

हरा-भरा माहौल रखें

अपने आसपास हरा-भरा वातावरण तैयार करें। इससे आपको शुद्ध हवा मिलेगी और मन को शुकून। इसके लिए हो सके तो अपने काम करने वाली जगह के आसपास कुछ पौधे लगायें। ये आपको सकारात्मक एनर्जी देंगे। घर पर भी गमले जरूर रखें और इसमें पौधे लगायें। स्वीडन में हुए एक शोध की मानें तो घर और ऑफिस का वातावरण हरा-भरा रखने से तनाव और थकान दूर होती है।

हरा-भरा माहौल रखें

सेब की सुगंध

एक सेब का सेवन रोज करने से बीमारियां दूर रहती हैं और यह आपको डॉक्टर से दूर रखता है। सिर्फ सेब ही नहीं बल्कि सेब की खुश्बू भी बहुत फायदेमंद है। शिकागो में हुए एक शोध की मानें तो सेब की सुगंध लेने से तनाव और सिरदर्द दूर हो जाता है। ऑर्टिफिशियल परफ्यूम लगाने से स्थिति खराब होती हैं वहीं दूसरी तरफ सेब की सुगंध से तनाव दूर होता है। इसके लिए आप सेब की खुश्बू वाला कैंडल भी प्रयोग कर सकते हैं।

सेब की सुगंध
 

समय पर काम पूरा करें

कामकाजी लोगों के लिए तनाव का सबसे बड़ा कारण है अधूरा काम, यानी कुछ कारणों से समय पर काम पूरा नहीं हो पाता और इससे तनाव होता है। तनाव से बचने का सबसे आसान तरीका यह भी है कि आप अपना काम समय पर पूरा करें। उस काम को करने की कोशिश न करें जो आपके बस में नहीं है। कई बार दिखावे के चक्कर में लोग अधिक काम करने की ठान लेते हैं और अधूरा रहने पर तनावग्रस्त हो जाते हैं। इससे बचने की जरूरत है।

समय पर काम पूरा करें

तकनीक से दूरी

हम ये स्वीकार करते हैं कि वर्तमान में मोबाइल और इंटरनेट से दूर रहना शायद संभव नहीं है। लेकिन इससे कुछ हद तक दूरी तो बनाई जा सकती है। क्योंकि तनाव के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार कारकों में यह भी है। इसलिए कोशिश करें कि 24 घंटे में कुछ घंटे ही मोबाइल पर बितायें।

तकनीक से दूरी

आसपास के माहौल को निहारें

काम के बीच कुछ मिनटों का ब्रेक लेकर आपसपास की चीजों को देखें। इससे आपकी आंखों को सुकून मिलेगा और तनाव भी दूर हो जायेगा। कुछ शोधों में यह साबित हुआ है कि तगातार काम के बीच ब्रेक न दिया जाये तो आंखों पर तनाव बढ़ता है जिससे सिरदर्द और तनाव होता है। इससे बचने के लिए काम के बीच में 20 मिनट का ब्रेक लें आसपास का माहौल निहारें।

आसपास के माहौल को निहारें

ये 5 अच्‍छी आदतें आपको बनाती है ‘होशियार’

अलग-अलग वैज्ञानिक रिसर्च की मानें तो ये शौक आपके मस्तिष्‍क तेज करने में आपकी मदद करते हैं। आइए जानते हैं उन 5 आदतों के बारे में…

ऐसे बने होशियार

दिमाग को तेज करने के लिए दिमाग को चलाना पड़ता है, इसके लिए कुछ ऐसे काम करने पड़ते हैं जिससे दिमाग शॉर्प और हमेशा एक्टिव रहे। दिमागी तौर पर होशियार बनना चाहते हैं तो आपको कुछ अलग तरह के शौक पालने होंगे। अलग-अलग वैज्ञानिक रिसर्च की मानें तो ये शौक आपके मस्तिष्‍क तेज करने में आपकी मदद करते हैं। आइए जानते हैं उन 5 आदतों के बारे में…

ऐसे बने होशियार

नियमित एक्‍सरसाइज

एक्‍सरसाइज से सिर्फ शरीर ही सुडौल नहीं बनती बल्कि नियमित एक्‍सरसाइज और योग से आपका दिमाग तेज होता है। प्रत्‍येक व्‍यक्ति को ये काम जरूर करना चाहिए।

नियमित एक्‍सरसाइज

म्‍यूजिकल इंस्‍ट्रूमेंट

अगर आप अपने शौक में कुछ शामिल करना चाहते हैा तो म्‍यजिकल इंस्‍ट्रूमेंट बजाना काफी अच्‍छा माना जाता है। दिमाग को शॉर्प बनाने का इससे बेहतर विकल्‍प और क्‍या हो सकता है।

म्‍यूजिकल इंस्‍ट्रूमेंट

विडियो गेम

कुछ लोगों का मानना है विडियो गेम समय की बर्बादी है। हालांकि अगर आप दिनभर वि‍डियो गेम खेलते हैं तो यह सेहत के लिए ठीक नहीं है। लेकिन विडियो गेम को समयबद्ध तरीके से खेला जाए तो यह आपके दिमाग को तेज करता है।

विडियो गेम

नई भाषा सीखें

रिजनल लैंग्‍वेज तो लोग बचपन से बोलने लगते हैं, इसके लिए ज्‍यादा मेहनत की जरूरत नहीं होती है। अगर आप कुछ अलग सीखना चाहते हैं तो आप दूसरी भाषाएं सीख सकते हैं। यह आपके दिमाग को शॉर्प करती हैं।

नई भाषा सीखें

किताबें पढ़ना

किताबें पढ़ना एक अच्‍छी आदत है। नियमित किताबें पढ़ने से व्‍यक्ति का दिमाग तेज होता है। ऐसा कई वैज्ञानिक रिसर्च में दावा किया जा चुका है।

किताबें पढ़ना

वर्ल्‍ड अल्जाइमर डे: भूलने की इस बीमारी को ऐसे करें कंट्रोल

अल्जाइमर के रोगियों में दिमाग का एक हिस्सा धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। यह ऐसी बीमारी है जिसका इलाज नहीं है! इस बीमारी को काबू में करने के लिए हम आपको कुछ ऐसे एक्‍सर्ट टिप्‍स दे रहे हैं जिससे बीमारी पर काबू पाया जा सकता है।
क्‍या है अल्‍जाइमर

अल्जाइमर को शुरुआत में पहचानना मुश्किल होता है। रोगी को पता ही नहीं चलता और यह बीमारी दिमाग को प्रभावित करके उसकी याद्दाश्त और सोचने-समझने की क्षमता में अवरोध उत्पन्न करने लगती है। रोग की चपेट में आने पर व्यक्ति ठीक से सोचने-समझने, बोलने, काम करने में परेशानी महसूस करने लगता है। उसका सामाजिक दायरा संकुचित होता चला जाता है और वह अपने आप में सिमटता चला जाता है। हालांकि बीमारी के शुरूआती दौर में नियमित जांच और इलाज से इस पर काबू पाया जा सकता है।

क्‍या है अल्‍जाइमर
 

इन गतिविधियों से पाएं अल्‍जाइमर पर काबू

इस बीमारी पर नियंत्रण पाने के लिए मरीज को बौद्धिक गतिविधियों से जुड़ा रहना चाहिए। पढ़ाई, खेलकूद जैसे क्रास वर्ड और अन्य दिमागी शक्ति लगने वाली गतिविधियों के साथ सामाजिक क्रियाकलाप में सक्रिय रहना चाहिए। रोज टहलना और थोड़ा व्यायाम करना चाहिए।

इन गतिविधियों से पाएं अल्‍जाइमर पर काबू

खानपान से रखे याददाश्त मजबूत

बादाम और ड्राई फ्रूट खाने से दिमाग तेज होता है और याददाश्त बढ़ती है। फूलगोभी के सेवन से दिमाग तेज होता है। इससे हड्डियां भी मजबूत होती हैं। यदि बढ़ती उम्र में लोग अपना काम खुद करते हैं तो उन्हें अल्जाइमर रोग होने का खतरा कम होता है और याददाश्त तेज होती है। अल्जाइमर के दौरान दिमाग में बढ़ने वाले जहरीले बीटा-एमिलॉयड नामक प्रोटीन के प्रभाव को ग्रीन टी के सेवन से कम किया जा सकता है। हरी पत्तेदार सब्जियां, फलियां, साबुत अनाज, मछली, जैतून का तेल अल्जाइमर रोग से लड़ने में मदद करती हैं।

खानपान से रखे याददाश्त मजबूत

अल्‍जाइमर के में ऐसे फूड से बचें

अगर अल्जाइमर रोग हो तो तिल, सूखे टमाटर, कद्दू, मक्खन, चीज, फ्राइड फूड, जंकफूड, रेड मीट, पेस्ट्रीज और मीठे का सेवन न करें।

अल्‍जाइमर के में ऐसे फूड से बचें
 

योग और व्‍यायाम से करें पाएं काबू

रोजाना व्यायाम और योग करके अल्जाइमर के प्रभाव को कम किया जा सकता है। मेडिटेशन करने से भूलने की समस्या पर काबू पा सकते हैं। याददाश्त तेज करने के लिए सर्वांगासन करें। दिमाग तेज करना हो और याददाश्त बनाए रखनी हो तो भुजंगासन करें। एकाग्रता बढ़ाने के लिए कपालभाति प्राणायाम करें।

योग और व्‍यायाम से करें पाएं काबू

प्राकृतिक तरीकों से करें अल्‍जाइमर का उपचार

अल्‍जाइमर ऐसी मानसिक बीमारी है जो धीरे-धीरे पनपती है, इसके कारण सोचने और समझने की क्षमता कमजोर हो जाती है, लेकिन प्राकृतिक तरीके से अगर इसका उपचार किया जाये तो इसका ईलाज हो सकता है।

अल्‍जाइमर रोग का प्राकृतिक उपचार

अल्‍जाइमर मानसिक बीमारी है जो धीरे-धीरे होती है। इसकी शुरूआत मस्तिष्‍क के स्‍मरण-शक्ति को नियंत्रित करने वाले भाग में होती है और जब यह मस्तिष्‍क के दूसरे हिस्‍से में फैल जाता है तब भावों और व्‍यवहार की क्षमता को प्रभावित करने लगता है। इसके कारण अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं। मानसिक रूप से आप खुद को व्‍यस्‍त रखकर इस बीमारी से बचाव कर सकते हैं। डांस, योग और ध्‍यान लगायें, किताबें पढ़ें, बोर्ड गेम्‍स आदि क्रियाकलापों से मष्तिष्क मजबूत होता है और इस बीमारी से बचाव होता है। लेकिन अगर यह बीमारी हो गई है तो प्राकृतिक उपचार आजमायें।

अल्‍जाइमर रोग का प्राकृतिक उपचार
 
 

काम का है पीपल

अल्जाइमर से जूझ रहे लोगों के लिए एक शोध से उम्मीद जगी है। उनके शोध में यह बात सामने आई कि अल्जाइमर के एन्जाइम की गतिशीलता को रोकने में पीपल काफी मददगार हो सकता है। पीपल के तने से लिये गए टिश्यू का लेबोरेटरी ट्रायल इसके समर्थन में रहा। गौरतलब है कि यह शोध चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के बायो टेक विभाग ने पीपल के पेड़ की मेडिसन प्रापर्टी पर किया गया।

काम का है पीपल

दिमाग को मजबूत करे हल्दी

हल्दी में मिलने वाले करक्यूमिन को नैनोतकनीक से नैनो-पार्टिकल में एनकैप्सूलेट कर अल्जाइमर का प्रभावी इलाज में मददगार हो सकते हैं। हल्दी में पाए जाने वाले प्राकृतिक तत्व करक्यूमिन के नैनो पार्टिकल के रूप में उपयोग से अल्जाइमर का इलाज हो सकता है। नैनो साइज के चलते हल्दी में मौजूद  करक्यूमिन कंपाउंड को दिमाग तक आसानी से पहुंचाया जा सकेगा। वहीं दूसरी ओर याददाश्त बनाए रखने के लिए आवश्यक न्यूरोन्स के रिजनरेशन में भी यह खोज प्रभावी हो सकती। गौरतलब है, यह खोज आईआईटीआर के निदेशक डॉ. कैलाश चंद गुप्ता और साइंटिस्ट डॉ. रजनीश कुमार चतुर्वेदी की टीम ने  की।

दिमाग को मजबूत करे हल्दी
 

अरोमा थेरेपी से दिमाग को रखें शांत

अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी कुछ मानसिक बीमारियों से बचाव में अरोमा थेरेपी काफी कारगर साबित हो सकती है। चूंकि अरोमा थेरेपी तनाव कम करती है, इसलिए इन रोगों से ग्रस्त लोगों को इस थैरेपी से काफी आराम होता है। कुछ मामलों में यह भी देखा गया कि अरोमा थेरेपी दिमाग तेज करने व भूली हुई यादों को वापस लाने में भी साहयक होती है।

अरोमा थेरेपी से दिमाग को रखें शांत
 

बड़े काम का है टमाटर

40 साल की आयु के बाद कोलेस्ट्रॉल का स्तर बिगड़ने से लेकर बीपी बढ़ने या घटने आदि समस्याएं होने की आशंका बढ़ जाती हैं। साथ ही इस आयु के बाद हृदय रोग और मधुमेह की भी आशंका बढ़ती है। एक शोध के अनुसार, 40 की आयु पार कर जाने के बाद अपने भोजन में बादाम, टमाटर, मछली आदि को नियमित रूप से शामिल करना चाहिए। शोध में यह भी पाया गया कि 20 मिनट की एक्सरसाइज के बाद 150 मिलीग्राम टमाटर का जूस पीने से कैंसर से भी बचाव होता है, दिल दुरुस्त रहता है और कई अन्य बीमारियां भी नियंत्रित होती हैं।
बड़े काम का है टमाटर

इन चीजों से बचें

अल्‍जाइमर व ऐसे अन्य रोगों व इनके कारकों से बचने के लिये वजन न बढ़ने दें, धूम्रपान न करें, शराब का सेवन न करें। इसका अलावा ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रिण में रखकर भी इस खतरे से बचा जा सकता है। साथ ही सिर पर किसी तरह की चोट लगने से भी खुद को बचाएं।

इन चीजों से बचें
 

मारिजुआना

दक्षिण फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में न्यूरोसाइंस के विशेषज्ञों ने एक अध्ययन में पाया कि मारिजुआना अल्‍जाइमर रोग से बचाव में काम आ सकती है। “जर्नल ऑफ अल्जाइमर डीज़ीज” में प्रकाशित एक लेख में से ये सूचना मिली। हालांकि इस संबंध में शोधकर्ताओं के भिन्न मत हैं।

मारिजुआना

घबराएं नहीं

अल्जाइमर रोगियों के मस्तिष्क में एसिटाइल कोलिन की मात्र कम पाई जाती है। इसलिए वे दवाएं दी जाती हैं जिससे मस्तिष्क में एसिटाइल कोलिन का स्तर नियंत्रित में रहे। अतः इस रोग के बारे में जितनी जल्दी पता चले, इसका उपचार भी उतना ही आसान होता है।

घबराएं नहीं

  अल्जाइमर रोगी इन तरीकों से लें छुट्टियों का मजा

अल्जाइमर रोगी मुश्किल से ही लोगों से घुल-मिल पाते हैं। क्योंकि जिनसे मिलते हैं उन्हें भी अपनी पहचान बार-बार याद दिलानी पड़ती है। लेकिन ऐसे में क्या रोगी जीना छोड़ दे? नहीं। तो इस स्थिति में अल्जाइमर रोगियों को ये तरीके अपनाने चाहिए जिससे कि वे भी छुट्टियों का मजा ले सकें।

अल्जाइमर रोगी ऐसे लें छुट्टियों का मजा

अल्जाइमर भूलने की बीमारी है जिसमें इंसान अचानक से सबकुछ भूल जाता है। इस बीमारी में डॉक्टर अल्जाइमर रोगियों को कहीं भी अकेले जाने या अकेले ना रहने की सलाह देते हैं। ऐसे में अल्जाइमर रोगी हमेशा किसी ना किसी के साथ ही रहता है और उसका बाहर आना-जाना पूरी तरह से बंद हो जाता है। ऐसे में अल्जाइमर रोगी अपनी बीमारी के बाद शायद ही कभी छुट्टियों का मजा ले पाते हैं। तो इस स्थिति में अल्जाइमर के मरीज इन तरीकों के जरिये छुट्टियों का मजा ले सकते हैं।

अल्जाइमर रोगी ऐसे लें छुट्टियों का मजा

पहले से तौयारी करें

अगर कोई अल्जाइमर का मरीज छुट्टियों की किसी तरह की प्लानिंग कर रहा है तो उसे इसकी पहले से तैयारी कर लेनी चाहिए। साथ ही अपने साथ रहने वाले पार्टनर से इस प्लानिंग की चर्चा भी कर लें क्योंकि फिर किसी भी तरह की अनचाही स्थिति के लिए आपका पार्टनर तैयार रहे।

पहले से तौयारी करें
  

घर पर ही रहें

घर पर ही पार्टी कर अल्जाइमर रोगी छुट्टियों का मजा ले सकते हैं। क्योंकि सामान्य तौर पर पार्टी में लाउड म्यूजिक और भीड़ होती है जो अल्जाइमर मरीजों के लिए नुकसानदायक होते हैं। इसलिए घर पर ही अपने करीबियों या दोस्तों को बुलाकर पार्टी या वीकेंड आयोजित करें। इस पार्टी के बारे में अपने पार्टनर को बता दें और उसकी पूरी तरह से मदद लें।

घर पर ही रहें
  

खाना बनाएं

अल्जाइमर रोगी कुछ भी चीजों को तुरंत अचानक से भूल जाते हैं इस कारण अल्जाइमर के रोगियों को उनकी बीमारी का पता लगने के बाद उनके घरवाले कभी भी खाना बनाने की अनुमति नहीं देते। ऐसे में अल्जाइमर रोगी अपने पार्टनर के साथ छुट्टी के दिन घर पर खाना बनाकर छुट्टियों का मजा ले सकते हैं। ये कुक थैरेपी की तरह है जिसमें मरीज को फिर से कुछ नया करने का एहसास होगा।

खाना बनाएं
  

इंडिपेंडेट ट्रवलिंग

किसी भी तरह की ट्रेवलिंग इंसान को पूरी तरह से रिफ्रेश कर देती है। इस कारण अगर कोई अल्जाइमर का मरीज इंडिपेंडेट ट्रवलिंग करना चाहते हैं तो कृप्या कर पूरी सावधानी बरतें और हर चीज पूरी तरह से पहले से ही तैयार कर लें। होटल और आने-जाने के लिए गाड़ी पहले से बुक करा लें। कम भीड़ वाली और पास की जगह चुनें। जिससे की आपका पार्टनर आपके कॉन्टेक्ट में हमेशा रह सके और किसी भी तरह की अनचाही स्थिति उत्पन्न होने पर आपके पास तुरंत पहुंच सके।

इंडिपेंडेट ट्रवलिंग

भावनाओं को काबू करना सीखें

भावनाओं को काबू करने के लिए जरूरी है कि आप अपनी भावनाओं को समझें। किसी भी बात पर भावुक हो कर प्रतिक्रिया देने से पहले स्थिति का आंकलन करना जरूरी होता है।
भावनाओं को काबू पाना मुश्किल नहीं

क्या कभी-कभी आपको अपनी भावनाओं पर काबू पाना मुश्किल लगता है? क्या आप जरा-जरा सी बात पर बुरा मान जाते, भड़क उठते या निराश हो जाते हैं? क्या जिंदगी की चिंताएं आप पर इस कदर हावी हो जाती हैं कि आप बिल्कुल लाचार महसूस करते हैं? ऐसे में जरूरी है कि भावनाओं पर काबू करना। आइए जानें यह कैसे संभव है।

भावनाओं को काबू पाना मुश्किल नहीं
सही जगह व्यक्त करें भावना

असल जिंदगी में भावनाओं पर काबू इतना आसान नहीं होता लेकिन मन के भावों की अभिव्यक्ति के लिए सही जगह और माहौल भी जरूरी है। कभी-कभी जब हम अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते जिससे अपने लिए मुश्किल भी खड़ी कर लेते हैं। भावनाओं पर काबू करना अपने आप में एक कला होती है। सही जगह पर अपनी भावनाओं को जाहिर करने से आपकी भावनाएं उपेक्षित होती हैं और आपकी भावनाओं की कद्र भी की जाती है।

सही जगह व्यक्त करें भावना
यह आप पर निर्भर है

भावुक होने के संदर्भ में सच कहें तो यह पूरी तरह से आप पर निर्भर हैं कि आप अपने अंदर अति भावुकता चाहते हैं या नहीं। अपनी भावनाओं पर काबू करना अपने अंदर एक तरह से स्किल डेवलप करना है ताकि हम और अच्छा कुछ कर सकें।

यह आप पर निर्भर है
 
 खुद को शांत करें

जब भी आप अपने को अति भावुकता से ग्रसत पाएं तो अपने आपको शांत करने की हमेशा कोशिश करें। सच कहें तो ज्यादा भावुकता आपके विचारों को बहुत ज्यादा प्रभावित करती है जिससे आप गलत फैसले भी ले सकते हैं।

खुद को शांत करें
 भावनाओं को जानें

जब तक आप अपनी भावनाओं को लेकर ज्यादा सजग नहीं रहेंगे तब तक आप इसे कंट्रोल करने के बारे में कैसे सोच पाएंगे। अपनी भावनाओं के प्रति जागरूक बनने के लिए जरूरत है इनको मॉनिटर किया जाए। इसके लिए आप यह जाने कि आप सबसे ज्यादा भावुक कब होते हैं। इससे आपको इन क्षणों को पहचानने में भी आसानी होगी।

भावनाओं को जानें
 क्यों होते हैं भावुक

अगर आप यह जान लेते हैं कि आप किस वजह से भावुक होते हैं तो फिर उन्हें नियंत्रित करना आसान हो जाता है। अगर आप इसके कारणों को नहीं जान पा रहे हैं तो अपने नजदीक लोगों जैसे दोस्तों से भी मदद ले सकते हैं। उनसे पूछें कि क्यों आप इतना ज्यादा हर बात को दिल से लगा बैठते हैं।

क्यों होते हैं भावुक
 
 हल निकालें

जब आपको यह पता हो जाएगा कि आप कब ज्यादा भावुक होते हैं और किन मुद्दे पर होते हैं तो फिर इसके सामाधान के बारे में सोचें। इसके लिए आप अपने सोचने के तरीके को बदलें ताकि आपकी भावनाएं आपके विचार को प्रभावित न करें बल्कि आपके विचार भावनाओं को लीड करें।

हल निकालें
 नियंत्रित हो प्रतिक्रिया

ज्यादातर ऐसा देखा जाता है कि भावुकता में बहकर हम कई बार किन्हीं मुद्दों पर गलत रिएक्ट कर जाते हैं। इस समस्या पर काबू पाने के लिए जरूरी है कि “आपको उस परिस्थिति में कैसे रिएक्शन देने हैं” यानि कि आप भावनाओं में बहकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं या फिर सोच-समझ कर दिमाग का इस्तेमाल कर प्रतिक्रिया देते हैं। कोशिश करें कि आपकी प्रतिक्रिया संयत हो।

नियंत्रित हो प्रतिक्रिया
 अपनी सीमाएं जानें

आप हर काम में निपुण नहीं हो सकते हैं। थोड़ी बहुत कमियां तो हर किसी में होती हैं। ऐसे में अपने कमजोर पक्षों को पहचानें और उन्हें मजबूत करने पर जोर दें। अपनी सीमाएं न जानना और गलत काम करना आपकी कमियों को दर्शाता है। अपनी सीमाएं पहचान कर भी आप भावनात्मक संतुलन बनाने में समर्थ होंगे।

अपनी सीमाएं जानें
 धीरे-धीरे करें शुरूआत

अपनी संवेदनाओं पर काबू करना एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में रातोरात किसी करिश्मे की उम्मीद न करें और न ही अधीर होकर आधे रास्ते से ही लौट पड़ें। शुरुआत शांत मन से करें। अपनी अति भावुकता के कारण हो सकने वाली समस्याओं को हमेशा दिमाग में रखें। यही इससे निपटने की कुंजी है।

धीरे-धीरे करें शुरूआत

अपने बर्थ-डे मंथ से जानें जिंदगी के कुछ खट्टे-मीठे राज

जन्‍म के महीने से व्‍यक्ति का व्‍यक्तित्‍व तो झलकता है साथ ही किसी के जन्‍म का महीना उसके स्‍वास्‍थ्‍य के बारे में भी बताता है, तो आप भी जानिये, क्‍या कहता है आपके जन्‍म का महीना?

किस महीने में पैदा हुए आप!

आप किस महीने में पैदा हुए हैं, इसका आपके स्‍वास्‍थ्‍य पर असर पड़ता है। आपके पैदा होने वाला महीना ही आपके संपूर्ण शरीर के स्‍वास्‍थ्‍य के बारे में बताता है। पैदा होने वाले महीने और बीमारियों को लेकर कई शोध हुए हैं, और इन शोधों में यह बात भी साबित हुई है कि शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य पर पूरी तरह से इनका असर पड़ता है। उम्र बढ़ने के साथ पैदा होने वाले महीने का असर आपके स्‍वास्‍थ्‍य पर पड़ता है। यानी आपके पैदा होने वाला आपके जीवन को बाद में पूरी तरह से प्रभावित करता है। तो आप जिस महीने में पैदा हुए हैं उस महीने से संबंधित स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या के बारे में जानिये।

किस महीने में पैदा हुए आप!
 

जनवरी

अगर आपका जन्‍म जनवरी महीने में हुआ तो आपका व्‍यक्तित्‍व बहुत ही आकर्षक होगा और खुशमिजाज होंगे। आप कड़ी मेहनत में विश्‍वास रखते हैं और अपने करियर को लेकर आप एक तरह की दीवानगी है। आप बहुत सामाजिक भी हो सकते हैं और आपके अंदर नेतृत्‍व करने की क्षमता कूट-कूटकर भरी हुई है। जनवरी में पैदा हुए लोग रचनात्‍मक भी होते हैं। जर्मनी में हुए शोध की मानें तो इस महीने में पैदा हुए लोग बायें हाथ के हो सकते हैं।
जनवरी

फरवरी

इस महीने में पैदा हुए लड़के और लड़कियां दोनों में सोचने और समझने की अद्भुत क्षमता होती है। इस महीने में जन्‍मे लोग जब खुश होते हैं तो खूब खुश होते हैं इतने कि खुशी आपसे संभाले नहीं संभलती और जब दुखी होते हैं तो खूब दुखी। ऐसे लोग अपने आप में एक रहस्य बनाकर चलते हैं। इस महीने में पैदा हुए लोगों को समझ पाना थोड़ा मुश्किल है।
Image courtesy: Getty Images

फरवरी
 

मार्च

इस महीने में पैदा होने वाले लोग मिलनसार होते हैं, और यात्राओं के शौकीन भी। इसके अलावा इस महीने में पैदा होने वाले लोग अधिक उत्‍साही और उत्‍सुक होते हैं, उनमें विभिन्‍न प्रकार की जानकारी इकट्ठा करने का जोश होता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर में 2014 में हुए एक शोध की मानें तो मार्च महीने में पैदा हुए लोगों में गैर-होजकिंग लिम्‍फोमा (non-Hodgkin’s lymphoma) के विकसित होने की संभावना 25 प्रतिशत अधिक रहती है।

मार्च
 

अप्रैल

अप्रैल महीने में पैदा हुए लोगों का आकर्षक व्‍यक्तित्‍व होता है, ये लोग जिद्दी और हंसमुख भी होते हैं। इस महीने में पैदा हुए लोगों को खुद के गुस्‍से पर काबू भी नहीं होता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर में 2014 में ही छपे शोध के अनुसार इस महीने में पैदा हुए लोगों की सफेद रक्‍त कोशिकाओं में कैंसर (non-Hodgkin’s lymphoma) होने की संभावना अधिक होती है। इसके अलावा 2012 में हुए एक अन्‍य शोध की मानें तो इस महीने में पैदा हुए लोगों में रूमेटाइड अर्थराइटिस, अल्‍सर, स्‍केलेरोसिस जैसी बीमारी होने की संभावना अधिक रहती है।

अप्रैल

मई

इस महीने में पैदा हुए लोग आकर्षक और लोकप्रिय होते हैं। लेकिन ये लोग थोड़े से लापरवाह और थोड़े से सनकी भी होते हैं। एक बार अगर कुछ ठान लें तो उसे पाकर ही रहते हैं। इस महीने में जन्‍में लोगों में कुछ कर गुजरने की संभावना अधिक होती है, ये लोग जीवन के साथ सही तरीके से तारतम्‍य बैठा लेते हैं। यूनाइटेड किंगडम में हुए एक शोध की मानें तो इस महीने में पैदा हुए लोगों में आंखों से संबंधित समस्‍याओं के होने की अधिक संभावना रहती है।

मई

जून

जून में पैदा हुए लोग जिद्दी और जुनूनी होते हैं। इस महीने में पैदा हुए लोगों को अधिक गुस्‍सा आता है और वे गुस्‍से पर नियं‍त्रण भी नहीं रख पाते हैं। इनकी जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इंग्‍लैड में हुए एक शोध की मानें तो जो लोग जून में यानी भयंकर गर्मी के महीने में पैदा होते हैं उनमें आंखों से संबंधित बीमारी मायोपिया या निकट दृष्टि दोष होने की संभावना 17 प्रतिशत तक अधिक होती है।

जून
 

जुलाई

इस महीने में पैदा हुए लोगों के दिमाग को समझना टेढ़ी खीर होता है, ये लोग अत्यंत रहस्यवादी और मूडी होते हैं। इनका दिल बहुत कोमल होता है और इनके अंदर प्रबंधन क्षमता कमाल की होती है। 2010 में हंगरी में हुए एक शोध की मानें तो जो बच्‍चे जुलाई महीने में पैदा होते हैं उनमें आत्‍महत्‍या की प्रवृत्ति दिसंबर में पैदा हुए बच्‍चों से 14 प्रतिशत अधिक होती है। हालांकि शोधकर्ताओं ने सर्वे के आधार पर यह निष्‍कर्ष निकाला न कि किसी बीमारी के आधार पर।

जुलाई

अगस्‍त

अगस्‍त महीने में पैदा हुए लोग पैसों का प्रबंधन सही तरीके से कर सकते हैं और उनका दिमाग तेज होता है। हां, ये लोग पैसे खर्च करने में थोड़ी कंजूसी बरतते हैं। इस महीने में जन्‍में लोगों की प्रतिभा का जवाब नहीं, ये लोग कला, साहित्य और विभिन्न रचनात्मक विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाते हैं। एलर्जी जर्नल में 2012 में छपे एक शोध की मानें तो इस महीने में जन्‍में लोगों को एलर्जी होने की संभावना अधिक होती है।

अगस्‍त

सितंबर

सितबंर महीने में पैदा हुए लोग अधिक उदार होते हैं और दूसरों की सहायता करने में ये लोग कभी पीछे नहीं हटते हैं। इनमें सीखने और समझने की क्षमता अन्य की तुलना से अधिक होती है। इस महीने में पैदा हुए लोग संघर्ष करने में पीछे नहीं हटते और मेहनत पर विश्‍वास करते हैं। इनके पारिवारिक जीवन में उतार-चढ़ाव आ सकता है। इस महीने में पैदा हुए लोगों को स्‍वास्‍थ्‍य का विशेष ध्‍यान रखना चाहिए, क्‍योंकि इन्‍हें एलर्जी संबंधित बीमारी (अस्‍थमा की संभावना सबसे अधिक) होने की संभावना अधिक होती है।

सितंबर